सुनंदा पुष्कर केस का आरोप पत्र दाखिल होने के एक साल बाद भी शुरू नहीं हुई सुनवाई




सुनंदा पुष्कर मौत मामले में घटना के पांच साल बाद भी मुकदमे की सुनवाई शुरू नहीं हो पाई है। आरोप पत्र दाखिल हुए मंगलवार को एक साल पूरा हो रहा है, लेकिन अभी तक आरोपों पर सुनवाई शुरू नहीं हो पाई है। दिल्ली पुलिस ने 14 मई 2018 को शशि थरूर के खिलाफ दहेज प्रताड़ना व खुदकुशी के लिए विवश करने की धाराओं में आरोप पत्र दाखिल किया था।

अदालत ने पांच जून 2018 को थरूर को बतौर आरोपी समन जारी किया था। वह सांसद हैं इसलिए उनके मामले की सुनवाई विशेष अदालत में होनी है। मौजूदा नियम के मुताबिक आरोप तय होने के एक साल के भीतर मुकदमे की सुनवाई पूरी होनी है, लेकिन जिस रफ्तार से सुनवाई चल रही उस हालात में ऐसा संभव नहीं है।

दिल्ली पुलिस ने पटियाला हाउस अदालत के एसीएमएम समर विशाल के समक्ष आरोप पत्र दाखिल लिया था। अदालत ने करीब आठ माह की सुनवाई के बाद केस को आठ फरवरी 2019 को सत्र अदालत के समक्ष भेज दिया था।  सुनंदा पुष्कर 17 जनवरी 2014 को दिल्ली के एक पांच सितारा होटल लीला में मृत पाई गई थीं। केस की एफआईआर जनवरी 2015 में दर्ज की गई थी, लेकिन थरूर को गिरफ्तार नहीं किया गया था।

इस केस में दिलचस्प बात यह भी रही कि जिस कमरे में सुनंदा मृत पाई गई थी, पुलिस ने उसे करीब साढ़े तीन साल तक बंद रखा और कोर्ट के आदेश के बाद ही इसे अक्तूबर 2017 में खोला गया था। दिल्ली पुलिस ने करीब चार साल के बाद मई 2018 में शशि थरूर के खिलाफ तीन हजार पन्नों की चार्जशीट दाखिल की थी।

इतना ही नहीं सुनंदा की मौत 2014 में हुई थी, लेकिन पुलिस ने इसके एक साल बाद 2015 में हत्या व अन्य धाराओं में एफआईआर दर्ज की थी। जांच के बाद खुदकुशी के लिए उकसाने व क्रूरता की धाराओं में चार्जशीट दाखिल की गई है। भाजपा नेता सुब्रमण्यम स्वामी भी इस मामले में अहम कड़ी रहे हैं। उन्होंने दिल्ली पुलिस की जांच पर सवाल उठाते हुए केस की जांच एसआईटी से करवाने की मांग करते हुए  6 जुलाई 2017 को हाईकोर्ट में याचिका दायर की थी।

हाईकोर्ट ने सुनवाई के बाद 26 अक्तूबर को स्वामी की याचिका खारिज कर दी थी। इसके बाद उन्होंने 29 जनवरी 2018 को सुप्रीम कोर्ट में अपील दायर की थी। मामले में आरोप पत्र दाखिल होने के बाद उन्होंने अदालत व अभियोजन की सहायता के लिए कोर्ट में अर्जी दायर की थी। इस अर्जी का अभियोजन व बचाव पक्ष ने विरोध किया था जिसके मद्देनजर अदालत ने इसे खारिज कर दिया था। इसके बाद स्वामी ने यह अर्जी नए सिरे से सत्र अदालत में दायर की और इस पर फैसला सुरक्षित रख लिया गया है।




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