ब्रज भ्रमण: नागरी कुंज में इन रसिकन की दुर्दशा देख तुमारौ जीऊ कलप उठैगौ




सांझी फूल लैन, सुख दैन, मन मैननि कौं। शयामा जू साथ यूथ जुबतिन के धाये हैं।।
चलत अधिक छवि छाजत छबीलीन कै। रंगीलिन के रंग रंग पट फहराए हैं।।
‘नागर’ निसान नाद नूपुर समूह बाजैं। अंग की सुवासन भ्रमर छूटि धाये हैं।
वृंदावन बीच पांइ धरत उठी यों जाइ। मानो घनश्याम जानि मोर कुकुकाये हैं।

राज पाट: वैभव तज ठाकुर के निज धाम में बसवे वारे भक्तन ते ही वृंदावन भक्ति कौ घर बनौ। बिनके भाव की रसधार नै याकू रस सिंधु बनायौ। कृष्ण मैं ऐसे रमे कि कृष्णमय है गए। बिनकी रसना युगल सरकार ऐ रिझारी करती। नित नयी रचत-रचत वे कवि है गए पर नया वृंदावन उन हरि भक्तन कू बिसार बैठी है। उनकी समाधि पै श्रद्धा के दो फूल चढ़ावे वारौ कोऊ नाय। भक्त कवि नागरिया ने सिगरे नाते तोड़ नटवर नागर से नेह की डोरी जोड़ी। पीछै-पीछै बिनकी बनी ठनी ऊ चली आईं और बांकेबिहारी की है गईं नागरी कुंज में इन रसिकन की दुर्दशा देख तुमारौ जी ऊ कलप उठैगौ।
दास-मान गली के सामने नागरी कुज बेबस खड़ी है। भक्त कविनागरीदास व बनी ठनी की समाधि झाड़-झक्कड़ में धूल फांक रही है। बाहरी दीवार पर अंकित समाधि स्थल के आखर भी धुंधला गाए हैं। कोने में नागरी दास जी की समाधि है। दूसरी समाधि का पत्थर टूटा पड़ा है। यहां पांच समाधियां है। नागरी दास जी को छोड़कर अन्य किसी पर नाम नहीं है। इनमें एक समाधि उनकी दासी बनी ठनी की मानी जाती है।
नागरीदास जी के वृंदावन आने के बाद उनकी दासी भी भजन करने आ गईं। बन ठन के रहने के कारण उनका नाम बनी ठनी पड़ गया। वह भी प्रयामा श्यामा श्यामा की भक्ति पर आधारित रचनाएं लिखती थीं।नागरी कुंज क्षेत्र में गोपाल जी का मंदिर है जहां नागरी दास के सेव्य ठाकुर पुगल किशोर विराजित हैं। किशनगढ़ स्टेट, राजस्थान के राजा सावंत सिंह (नागरीदास) ने सन् 1764 में आश्विन शुक्ल दशमी को युगल किशोर के विग्रह प्रतिष्ठित किए।

जीवन वृत्त
किशनगढ़ के राजा सावंत सिंह सांसारिक विरक्त के बाद नागरीदास कहलाए।नागरिया इनके नाम की छाप थी। युवावस्था से ही मन में वैराग्य की भावना जागृत हो गई थी। हमेशा वृंदावन की रज में रमणने की इच्छा थी। सन् 1757 को राजा कुल , परिवार त्याग निज धाम आ गए । जिस स्थान पर रहे, वह निंबार्क संप्रदाय का स्थल , नागरी दास का घेरा व नागरी कुंज आदि मों से विख्यात हुआ । नागरीदास जी ने सवंत 1821 भाद्रपद पंचमी को निकुंज धाम में प्रवेश किया। नागरीदास जी हिंदी काव्य परंपरा में रीति काल के कवि थे । इनकी भक्ति परक रचनाऐं नागर समुच्चय के नाम से प्रकाशित हुई।

कब वृंदावन धरन में, चरन परैंगे जाय
लोटि धूरि धरि शीश पर, कछु मुख मैं पाय

अब तो यही बात मन मानी
छांड नहीं श्याम-श्यामा की, वृंदावन राजधानी
हरि भक्ति मै रक्तति ह्वै हीं, निंदा मुख अभिमानी (नागरीदास)

किते दिन बिन वृंदावन खोये
यौ ही वृथा गए ते अब लौं, राजस रंग समोसे
छांडि पुलिन फूलन की सज्जा, सूल सरनि पर सोये
भीजे रसिक अनन्य न दरसे, विमुखनि के मुख जोये
हरि विहार की ठौर रहे नहिं, अति अभाग्य बल खोये

कलह सराय बसाय भिठारी, माया रांड बिगोये

इक रस हांके सुख तजि कैं, ह्वॉं कभू हंसे कभु रोये
कियौ न अपनौ काज पराये, शीश भार पर ढोये
पायो नहीं आनंद लेस मैं, सबै देश टक-टोये
नागरीदास बसे कुंजनि मैं, जब सब विधि सुख भोये




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