इन पशु-पक्षी को भोजन दिए बिना अधूरा माना जाता है श्राद्ध

यूनिक समय, मथुरा। श्राद्ध से जुड़े कई नियम हैं जो पुरातन समय से चले आ रहे हैं। उन्हीं में से एक नियम ये भी है कि श्राद्ध के भोजन से गाय, कौए और कुत्ते के लिए भोजन जरूर निकाला जाता है। इन पशु-पक्षियों को भोजन दिए बिना श्राद्ध अधूरा माना जाता है। इन तीनों पशु-पक्षियों का हिंदू धर्म में विशेष महत्व बताया गया है, इसिलए इन्हें श्राद्ध का भोजन करवाने से पितरों की आत्मा को शांति मिलती है। आगे जानिए गाय, कौए और कुत्ते को श्राद्ध का भोजन क्यों दिया जाता है…..

यम का प्रतीक हैं कौए
धर्म ग्रंथों के अनुसार, कौआ यम का प्रतीक है, जो दिशाओं का फलित (शुभ अशुभ संकेत बताने वाला) बताता है। इसलिए श्राद्ध का एक अंश इसे भी दिया जाता है। कुछ ग्रंथों में कौओं को पितरों का स्वरूप भी बताया गया है। एक मान्यता है भी कि श्राद्ध का भोजन कौओं को खिलाने से पितृ देवता प्रसन्न होते हैं और श्राद्ध करने वाले को आशीर्वाद देते हैं। कई ग्रंथों में कौए से जुड़ी कथाएं भी पढ़ने को मिलती हैं। एक बार देवराज इंद्र के पुत्र जयंत ने भी कौए का रूप धारण किया था।

वैतरणी नदी पार करवाती है गाय
धर्म ग्रंथों के अनुसार, जब किसी व्यक्ति की मृत्यु हो जाती है तो उसकी आत्मा पितृ लोक तक जाती है। इस बीच में वैतरणी नाम की एक नदी पड़ती है जिसे गाय की पूंछ पकड़कर पार किया जाता है। जो लोग गाय की सेवा करते हैं और उन्हें भोजन देकर प्रसन्न रखते हैं वे ही वैतरणी नदी पार कर पाते हैं। इसलिए श्राद्ध के भोजन का एक अंश गाय को भी दिया जाता है। गाय को भोजन देने से सभी देवता तृप्त होते हैं।

यमराज का पशु है कुत्ता
धर्म ग्रंथों में कुत्ते को यमराज का पशु माना गया है। इसलिए श्राद्ध के भोजन का एक अंश इसको देने से यमराज प्रसन्न होते हैं। शिवमहापुराण के अनुसार, कुत्ते को रोटी खिलाते समय बोलना चाहिए कि- यमराज के मार्ग का अनुसरण करने वाले जो श्याम और शबल नाम के दो कुत्ते हैं, मैं उनके लिए यह अन्न का भाग देता हूं। वे इस बलि (भोजन) को ग्रहण करें। इसे कुक्कर बलि कहते हैं।

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