ये है मथुरा की विशेषता




देववन मथुरा तथा उसके अवान्तर के तीर्थों का माहात्म्य
भगवान कहते है अधर्मी एवं दुरात्मा मनुष्य भी मथुरा के सेवन से तथा वहॉ के वनों के दर्शन अथवा उस पुरी की परिक्रमा से नरक क्लेश से मुक्त हो जाते है तथा स्वर्ग भोग के अधिकारी हो जाते है
इस मथुरामण्डल में बारह वन है जिनके नाम क्रमश: इस प्रकार है मधुवन, तालवन, कुन्दवन काम्यकवन, बहुवन, भद्रवन,खदिरवन, महावन, लौहवन, बिल्ववन, भाण्डीरवन और वृन्दावन लौहवन के प्रभाव से प्राणी के समस्त पाप दूर हो जाते है तथा बिल्ववन तो देवताओं से भी प्रशंसित है जो मानव इन वनों का दर्शन करते है उन्हें नरक नही भोगना पड़ता
भगवान शिव इस मथुरापुरी की निरन्तर रक्षा करते है उनके दर्शनमात्र से मथुरा का पुण्य फल सुलभ हो जाता है बहुत पहले रुद्र ने पूरे एक हजार वर्ष तक मेरी कठिन तपस्या की थी मेंने सन्तुष्ट होकर कहा था हर आपके मन में जो भी हो वह वर मुझसे मॉग लें
महादेव जी वोले देवेश आप सर्वत्र विराजमान है आप मुझे मथुरा में रहने के लिये स्थान देने की कृपा करे इस पर मेंने कहा देव आप मथुरा में क्षेत्रपाल का स्थान ग्रहण करे मै यह चाहता हूं जो व्यक्ति यहॉ आकर आपका दर्शन नहीं करेगा उसे कोई सिद्धि प्राप्त न होगी जिस प्रकार स्वर्ग में इन्द्र की अमरावतीपुरी है वैसी ही जम्बूद्वीप में यह मथुरा पुरी है यहॉ पर एक एक पैर रखने पर भी अश्वमेध यज्ञों का फल मिलता है इस क्षेत्र में साठ करोड़ छ: हजार तीर्थ है गोवर्धन तथा अक्रूरक्षेत्र ये दो करोड़ तीर्थों के समान है एवं प्रस्कन्दन और भाण्डीर ये छ: कुरुक्षेत्रके समान है सोमतीर्थ चक्रतीर्थ अविमुक्त तिन्दुक और अक्रूर नामक तीर्थों की द्वादशादित्य संज्ञा है मथुरा के सभी तीर्थ कुरुक्षेत्र से सौ गुना बढ़कर है जो मथुरा पुरी के इस माहात्म्य को पढ़ता या सुनता है वह परमपद को प्राप्त होता है और अपने मातृ पितृ दोनों पक्षों के दो सौ बीस पीढ़ियों का उद्धार कर देता है




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